अजी ये शास्त्रीय संगीत की आ आ उ उ तो हमें समझ नही आती न जाने क्या क्या गाते रहते हैं ,गाते हैं या चिल्लाते हैं , की निचे आवाज से उपर आवाज चढा कर बस आ आ उ उ किया करते हैं ?कभी धीमे धीमे आ आ उ उ किया करते हैं ,कभी जल्दी जल्दी आवाज को भगा भगा कर आ आ उ उ किया करते हैं ,कुछ भी हो हैं तो आ आ उ उ ही ,हमारी समझ से तो परे की बात हैं ,इसलिए हमें तो न सुनना पसंद हैं न सुनाने वाले कलाकारों का सुनाना .
ऐसे उदगार वयक्त करते हुए कई महानुभावो को कई कई बार देखा हैं ,उनका भी कोई दोष नही ,शास्त्रीय संगीत को समझा ही जगत से परे की वस्तु जाता हैं की उसे समझने की इच्छा या उसे समझना दोनों ही असंभव लगते हैं ,जिन्हें शास्त्रीय संगीत आ आ उ उ लगता हैं ,उनके लिए यह लेख। शायद यह लेख कई कड़ियों में देना पड़े ,अब पुरी आ आ उ उ जो समझानी हैं :-) ।
ह्रदय के भावो को वयक्त करने के लिए जब मानव ने बोलना सिखा उससे पहले ही आवाज़ को ऊँचा निचा कर अपनी बात सामने वाले को समझाने की कला सीखी । जब उसने बोलना सिखा तो यह आवाज़ को चढाना या घटना उसके वाकचातुर्य या कहे बोलने की कला का उत्कृष्ट साधन बन गया ,उसने अनुभव किया की बोलते समय आवाज़ को निश्चित से ज्यादा कपाया या खीचा नही जा सकता लेकिन जब उसने आवाज़ को खीचने और सुन्दरतम रूप में कंपित करने की कला जानी तो उसने ईश्वरीय वरदान पाया.वह था सुर । इस सुर के सहारे संगीत के निर्मिती की विद्या मानव जाती ने पाई हुई सर्वाधिक आलौकिक और मधुर विद्या थी । जो उसने अपने अनुभव से धीमे धीमे सीखी ,पहले साम संगीत ,लोक संगीत ,और फ़िर शास्त्रीय संगीत और संगीत के न जाने कितने प्रकार ।
शास्त्रीय संगीत वह संगीत जिसका अपना एक शास्त्र हो ,जिसके अपने नियम हो , जीवन की अगर बात करे तो अगर हमें किसी मंजिल को पाना हैं तो सर्वप्रथम हम मंजिल को जाने वाली दिशा निर्धारित करेंगे ,तत्पश्चात मंजिल की और धीमे धीमे ,एक एक टप्पे के साथ ,जीवन का गणित बिठाते ,सजाते ,हँसते -खेलते ,कभी कुछ पल विश्राम करते ,कभी मंथर गति से चलते ,कभी तेजी से भागते , हुए मंजिल तक पहुँचेगे । हमारे जीवन की तरह विशाल और सुंदर और सरल नियमो से बंधा हुआ हैं शास्त्रीय संगीत ।
शास्त्रीय संगीत की मंजिल हैं आत्मिक आनंद जो कलाकार अपने संगीत से स्वयं और श्रोता के लिए उपलब्ध करवाता हैं और इस मंजिल को पाने के लिए कलाकारों को विविध टप्पों से होकर गुजरना पड़ता हैं ,यथा आलाप , ,ख्याल या बंदिश ,तान और इसमे सम्मिलित बहुत सी बातें . जिसे कला प्रेमी आ आ उ उ करार देते हैं :-)इसी आ आ उ उ की प्रथम कड़ी के रूप में हम आज समझेंगे आलाप को ।
शास्त्रीय संगीत के आज के रूप की नीव रखी प्राचीन काल में प्रचलित ध्रुपद गायन ने ,(ख्याल की नीव रखी साधारण गीति ने जिसे हम बाद में समझेंगे )ध्रुपद गायन के बारे में जैसा की वाणी पर उपलब्ध अपनी पोस्ट में मैने बतलाया था की पहले यह मंदिरों में प्रचलित था फ़िर यह रजवाडो और दरबारों में प्रचलित हुआ ,ग्वालियर के महाराजा मानसिंह जिनकी महारानी मृगनयनी थी ने प्रचलित करने में बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई इस ध्रुपद गायकी में आलाप गायन का बड़ा महत्व हैं । आलाप .................................ओफ .............. ये आलाप होता क्या हैं ?
अच्छा एक कल्पना करते हैं ,आप सभी को मालूम हैं संगीत में सात सुर होते हैं ,सा रे ग म प ध नि इन्ही सुरों के आधार पर संगीत की पुरी दुनिया टिकी हैं । राग के बारे में मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया हैं और यह भी बताया हैं की हर राग में एक वादी स्वर होता हैं जो राग का सर्व प्रमुख स्वर होता हैं ,एक संवादी एक विवादी और अन्य न्यास स्वर होते हैं अर्थात जिन पर गायन के समय रुका जा सकता हैं .कल्पना कीजिये हम राग बिहाग गा रहे हैं .उसमे किए जाने वाले आलापों को समझ ने के लिए अब हम ये सोच लेते हैं की हमारा घर मुंबई में हैं जिसका नाम स्वर सा हैं .एक अन्य घर भोपाल में हैं जिसका नाम यथा हम राग बिहाग गा रहे हैं तो वादी अर्थात ग हैं ,हमारे माँ पापा का घर उज्जेन में हैं जो संवादी अर्थात नि हैं ,इसके आलावा हमारे रिश्तेदार का घर बरोड़ा में हैं ,जिसका नाम प हैं व अन्य मित्रो के घर अन्य शहरो में यथा इंदोर ,गोवा वाराणसी में हैं जिनके नाम म रे ध आदि हैं । जब हम आलाप करते हैं तो हम स्वरों के साथ खेलते हैं ,हम इधर उधर से घूम कर यानि इस स्वर से उस स्वर जाकर स्वरों के सुंदर और अद्भुत जोड़े या मेल बनाकर सा और वादी संवादी और अन्य न्यास स्वरों पर रुकते हैं सबसे ज्यादा बार गायन या वादन करते हैं वादी स्वर का सबसे ज्यादा बार सा यानि अपने घर पर रुकते हैं ,फ़िर अपने दुसरे घर यानि ग फ़िर संवादी याने अपने माता पिता के घर जिसका नाम हमने नि रखा हैं रुकते हैं ,फ़िर कभी कभी विवादी स्वरों अर्थात उन रिश्तेदारों के यहाँ भी घूम कर आते हैं जो हमें ज्यादा पसंद नही और आते कहाँ हैं?अपने घर यानि सा पर ,कभी कभी मित्रो के घर भी जाते हैं वहां कुछ गप्पे शप्पे करते हैं ,आस पास के शानदार वास्तु को देखते हैं और घूम घाम कर अपने घर ही आ जाते हैं ,जिस प्रकार हम अपने जीवन में सबके यहाँ वहा जाते हैं समय बिताते हैं अपने सुख और आनदं के लिए तरह तरह के लोगो से मिलते हैं नई नई जगह देखकर फोटो खीच कर अच्छा खाना खाकर मन बहलाते हैं ठीक उसी प्रकार शास्त्रीय संगीतकार आलाप करता हैं यानि सा पर फ़िर वादी संवादी और अन्य न्यास स्वरों पर रुकता हुआ आलाप करता हैं ,हर बार सबसे ज्यादा सा पर आता हैं और नई नई कल्पनाओ से स्वर और राग सजाते हुए अन्य स्वरों पर राग नियमो के अनुसार रुकते हुए आलाप करता हैं ,अब आलाप करते समय ध्रुपद के ज़माने में उं हरी अनंत नारायण जैसे शब्दों का प्रयोग होता था,अब हर किसी संगीतग्य को इन शब्दों के साथ गाना आसन मालूम नही हुआ तो उसने इन शब्दों के स्थान पर और स्वरों के नामो की जगह आ आ करके आलाप करना शुरू किया ,तो यहाँ से शुरू हुआ आ आ उ ऊ का चक्कर ,आज इतना ही,साउंड फाइल उपलोड नही हो सकने के कारण आज आलाप नही सुनवा पा रही हूँ शायद अगली पोस्ट में सुनवा सकूँ।
ऐसे उदगार वयक्त करते हुए कई महानुभावो को कई कई बार देखा हैं ,उनका भी कोई दोष नही ,शास्त्रीय संगीत को समझा ही जगत से परे की वस्तु जाता हैं की उसे समझने की इच्छा या उसे समझना दोनों ही असंभव लगते हैं ,जिन्हें शास्त्रीय संगीत आ आ उ उ लगता हैं ,उनके लिए यह लेख। शायद यह लेख कई कड़ियों में देना पड़े ,अब पुरी आ आ उ उ जो समझानी हैं :-) ।
ह्रदय के भावो को वयक्त करने के लिए जब मानव ने बोलना सिखा उससे पहले ही आवाज़ को ऊँचा निचा कर अपनी बात सामने वाले को समझाने की कला सीखी । जब उसने बोलना सिखा तो यह आवाज़ को चढाना या घटना उसके वाकचातुर्य या कहे बोलने की कला का उत्कृष्ट साधन बन गया ,उसने अनुभव किया की बोलते समय आवाज़ को निश्चित से ज्यादा कपाया या खीचा नही जा सकता लेकिन जब उसने आवाज़ को खीचने और सुन्दरतम रूप में कंपित करने की कला जानी तो उसने ईश्वरीय वरदान पाया.वह था सुर । इस सुर के सहारे संगीत के निर्मिती की विद्या मानव जाती ने पाई हुई सर्वाधिक आलौकिक और मधुर विद्या थी । जो उसने अपने अनुभव से धीमे धीमे सीखी ,पहले साम संगीत ,लोक संगीत ,और फ़िर शास्त्रीय संगीत और संगीत के न जाने कितने प्रकार ।
शास्त्रीय संगीत वह संगीत जिसका अपना एक शास्त्र हो ,जिसके अपने नियम हो , जीवन की अगर बात करे तो अगर हमें किसी मंजिल को पाना हैं तो सर्वप्रथम हम मंजिल को जाने वाली दिशा निर्धारित करेंगे ,तत्पश्चात मंजिल की और धीमे धीमे ,एक एक टप्पे के साथ ,जीवन का गणित बिठाते ,सजाते ,हँसते -खेलते ,कभी कुछ पल विश्राम करते ,कभी मंथर गति से चलते ,कभी तेजी से भागते , हुए मंजिल तक पहुँचेगे । हमारे जीवन की तरह विशाल और सुंदर और सरल नियमो से बंधा हुआ हैं शास्त्रीय संगीत ।
शास्त्रीय संगीत की मंजिल हैं आत्मिक आनंद जो कलाकार अपने संगीत से स्वयं और श्रोता के लिए उपलब्ध करवाता हैं और इस मंजिल को पाने के लिए कलाकारों को विविध टप्पों से होकर गुजरना पड़ता हैं ,यथा आलाप , ,ख्याल या बंदिश ,तान और इसमे सम्मिलित बहुत सी बातें . जिसे कला प्रेमी आ आ उ उ करार देते हैं :-)इसी आ आ उ उ की प्रथम कड़ी के रूप में हम आज समझेंगे आलाप को ।
शास्त्रीय संगीत के आज के रूप की नीव रखी प्राचीन काल में प्रचलित ध्रुपद गायन ने ,(ख्याल की नीव रखी साधारण गीति ने जिसे हम बाद में समझेंगे )ध्रुपद गायन के बारे में जैसा की वाणी पर उपलब्ध अपनी पोस्ट में मैने बतलाया था की पहले यह मंदिरों में प्रचलित था फ़िर यह रजवाडो और दरबारों में प्रचलित हुआ ,ग्वालियर के महाराजा मानसिंह जिनकी महारानी मृगनयनी थी ने प्रचलित करने में बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई इस ध्रुपद गायकी में आलाप गायन का बड़ा महत्व हैं । आलाप .................................ओफ .............. ये आलाप होता क्या हैं ?
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