10/21/2009

रिश्ते यु भी बनते हैं

कभी सोचा भी नहीं था की दूर कहीं झारखंड में मेरा कोई अपना होगा ,वो  जिसे मैंने अब तक देखा ही नहीं ,जिसका नाम भी आज से दो साल पहले तक मैंने नहीं सुना था .एक दिन अचानक  जैसे ईश्वर ने ही खुश होकर मेरे लिए किसी को भेजा हो, ऐसा ही प्यारा सा रिश्ता "बड़ी दीदी "का मेरे पास आता हैं और हमेशा के लिए मुझे एक प्यारी सी बड़ी दीदी से मिलवाता हैं .
मैं बात कर रही हूँ ,हम सबकी प्रिय चिठ्ठाकार रंजना दीदी की ,जिनके विचार ,जिनकी पोस्ट हमेशा से ही उनसे अपनत्व का आभास कराती रही ,और उनका बड़प्पन की उन्होंने ही मुझे अपनी छोटी बहन मान लिया .बड़ा अच्छा लगता हैं ,की घर में सब भाई बहनों में सबसे बड़ी होने वाली मुझे, आज एक बहुत सुलझी हुई,महान विचारो वाली लेखिका जो तकनिकी संसथान में प्रबंध निदेशक भी हैं ,अपनी बड़ी बहन के रूप में मिल गयी हैं .प्रस्तुत हैं मेरी बड़ी दीदी(रंजना दीदी) से हुई वीणापाणी के लिए हुई मेरी बातचीत .




दीदी भारतीय संगीत आपकी नज़र में क्या हैं ?
भारतीय संगीत ,संगीत की आत्मा है... आत्मा का खुराक है...मुक्ति का द्वार है... शाश्वत सात्विक आनंद का श्रोत  है...


कितनी देर संगीत सुनती हैं आप ?


गृहस्थ आश्रम में प्रवेश से पूर्व पढाई लिखाई के बाद सारा समय साहित्य और संगीत को ही समर्पित था..परन्तु व्यस्तताओं के साथ यह समयावधि भी न्यूनतम होती गयी..मुझे एकांत में संगीत में डूबना प्रिय है..इसमें किसी प्रकार का विघ्न यदि उपस्थित होता है तो बड़ा ही अरुचिकर लगता है..संगीत मेरे लिए ईश्वर से जोड़ने वाली कड़ी है और यह टूटे ,कैसे सही होगा....इधर तो कई वर्षों से एकांत का नितांत ही अभाव रहा है...फिर भी यथासंभव प्रयास होता है मेरा कि सोने से पहले तथा  सुबह उठकर संगीत का आनंद लूँ.


दीदी आपको वोकल ज्यादा पसंद है या इन्स्ट्रूमेंटल ?
 दोनों ही तरह के संगीत प्रिय हैं..


 संगीत की कितनी प्राथमिकता है आपके  जीवन में?
    बहुत बहुत अधिक .


क्या आपके पास आपके पसंदीदा संगीत का कलैक्शन भी हैं या जैसा सुनने को मिल जाए?
ईश्वर की कृपा से अच्छा  खासा संग्रह है मेरे पास..


आपको क्या लगता हैं दीदी एफएम क्रांति भारतीय संगीत के प्रसार के लिए सहायक है या अपसंस्कृति ?


एक एम् संगीत पूर्णतः बाजारवाद की चपेट में है.आज संगीत के नाम पर जो भी फिल्मो में या गैर फिल्मी संगीत रचित होतें हैं निन्यानवे प्रतिशत शोर के सिवाय कुछ भी नहीं और ये ऍफ़ एम् चैनल  केवल शोर ही परोसते हैं...इसलिए ये संगीत का कितना भला करेंगे,समझा जा सकता है..


आप सिर्फ श्रोता हैं या खुद भी संगीत की किसी विधा की शिक्षा ली है?


मैंने बाल्यावस्था में शास्त्रीय संगीत की लगभग तीन वर्ष तक विधिवत शिक्षा ली थी.परन्तु विपरीत परिस्थितिवश  वह अधूरी ही रह गयी..विवाह के बाद हम जिस जगह रहते थे वहां स्थानीय बच्चों(बड़े बच्चों) महिलाओं  के साथ मिलकर एक म्यूजिक ग्रुप भी बनाया था और बहुत से शो किये..पर स्थानान्तरण के साथ ही वह ग्रुप भी छूट गया और वर्टिगो (कान की बीमारी) के कारण स्वयं का गाना/रियाज तथा सुनना भी बहुत कम हो गया...लेकिन अब जब कुछ स्वस्थ हूँ,फिर से संगीत शिक्षा नए सिरे से आरम्भ करने की ठानी है...देखा जाय इसबार यह पूरी हो पाती है या नहीं.


और ख़ुशी की बात यह हैं की इस  भेंटवार्ता के कुछ ही दिनों बाद दीदी ने मुझे बताया की उन्होंने संगीत की शिक्षा लेना आरम्भ कर दी हैं . 


आपके परिवार में संगीत का माहौल है या सिर्फ आपकी रुचि विकसित हुई?


मेरे पिताजी विशुद्ध तकनीकी क्षेत्र  के होते हुए भी स्वयं ही गीत लिखते और उन्हें गाया करते थे...उनका गायन किसी को भी विभोर कर देता था.मुझमे संगीत से प्रेम उन्हीके संस्कार से विरासत में मिला जो उत्तरोत्तर विकसित हुआ..


भारतीय संगीत की  लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम होने के कारण?(आपको क्या लगता हैं की भारतीय संगीत क्यों लोगो को दूसरे संगीत के मुकाबले कम आकर्षित कर रहा हैं ?)


यह तथ्य मुझे भी बड़ा ही आहत किया करता है,परन्तु सत्य तो यही है. मुझे इसके मूल में जो पहला कारण दीखता है वह यह है कि अनेक माध्यमो द्वारा जो अनजाने ही लोगों के मन में पाश्चात्य भाषा संस्कृति और संगीत को श्रेष्ठ साबित करते हुए उसके प्रति आदर आस्था का भाव गहरे ह्रदय में आरोपित किया जा रहा है तथा इसके विपरीत भारतीय शास्त्रीय संगीत,भाषा,संस्कृति आदि  के प्रति तिरस्कार का भाव  बैठाया जा रहा है,उसके कारण ही शास्त्रीय संगीत  अधिकाँश भारतीय संगीत श्रोताओं द्वारा उपेक्षित तिरस्कृत  हो रहा है..


दूसरा कारण यह है कि जैसे जैसे लोगों में आहार विहार आदि के कारण तमोगुण का  विकास  होता जा रहा है,स्वाभाविक ही सतोगुण युक्त शास्त्रीय संगीत व्यक्ति को वह उन्माद नहीं दे पाती जो आज का शोर शराबा वाला संगीत दिया करती है.आज अधिकाँश लोगों को रूह का सुकून नहीं बल्कि उत्तेजक ऐसा संगीत चाहिए जो कान दिमाग के तंतुओं को झकझोर सके,पैरों को थिरका सके...


फिर भी मैं बहुत ही आशान्वित इसलिए हूँ कि जैसे पश्चिम आज अतिभौतिकता और वैयक्तिकता से ऊबकर भारतीयता को स्वीकार रहा है और उसीमे उसे सात्विक आनंद तथा शांति मिल रही है कभी न कभी उनका अनुकरण कर ही सही घर से गए भी फिर घर को लौटकर आयेंगे और अपने सभ्यता संस्कृति की श्रेष्ठता को स्वीकार करेंगे..


मुझे यह भी हर्षित किया करता है कि आज विभिन्न संस्थानों द्वारा  बड़े सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं शास्त्रीय संगीत को राष्ट्रिय अंतराष्ट्रीय बड़े मंचों पर स्थापित करने की भी और सर्वसाधारण के बीच भी लाने की...


वैसे पूर्णतः हतोत्साहित होने की बात नहीं है,आज भी संवेदनशील प्रबुद्ध वर्ग इससे गहरे जुड़ा हुआ है.गायक तथा श्रोता का अनुपात पिछले दो दशक से बेहतर ही हुआ है..




आप किस तरह का संगीत पसंद करती  हैं दीदी  ?(भारतीय शास्त्रीय  संगीत,लोक संगीत ,सुगम संगीत यथा गीत ,भजन ,ग़ज़ल ,या फ़िल्मी संगीत )


उपर्युक्त सभी..हाँ फिल्म संगीत में  केवल वैसे गीत जो कोमल मधुर कर्णप्रिय हों और उसमे शास्त्रीय संगीत का थोडा सा भी पुट हो.


आपका पसंदिता कोई गीत ?(संभव हो तो आपकी आवाज़ में)
यह कठिनतम प्रश्न है..एक गीत ध्यान में लाने का प्रयास करते ही दिमाग में रेलम पेल मच जाती है.ह्रदय से जुड़े सारे तो अपने ही हैं,तो उसमे से किसे आगे करूँ और किसे पीछे...लगभग एक दशक पहले एक फिल्म आई थी "सरदारी बेगम" ...उसमे एक गीत था..." चली पी के नगर....बन के दुल्हन.....मैके में जी घबरावत है...अब साँची नगर को जाना है.....ये झूठा नगर कहलावत है...." और  छुन्नुलाल  मिश्र जी की गाई ...." सर धरे मटकिया डोले रे.....कोई श्याम मनोहर लो रे "....


आपके अनुसार क्या प्रयास किये जाने चाहिए भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाने हेतु ?
जैसे वयानुसार औषधि की मात्रा कम से अधिक की जाती है,वैसे ही शास्त्रीय संगीत सुनने समझने में जो अपरिपक्व बालक सम हैं उन्हें पहले फ़िल्मी गीतों के माध्यम से शास्त्रीयता  के पुट वाले संगीत(क्योंकि आम भारतीय जनमानस पर जितना प्रभाव सिनेमा का पड़ता है,उतना और किसी का भी नहीं),तत्पश्चात उपशास्त्रीय गायन (सेमी क्लासिकल)/ संगीत  और फिर शास्त्रीय संगीत का खुराक यदि दिया जाय तो उसकी ग्रहण शक्ति का विकास किया जा सकता है और इस संगीत को व्यापकता मिल सकती है...


अगर आपको भारतीय संगीत के किसी एक वाद्य को चुनने का मौका मिला तो आप किस वाद्य को अपना वोट देंगे ,जैसे सितार गिटार, वीणा, सरोद, वायलिन.


मैं वहां से भाग निकलूंगी,बिना वोट किये....क्योंकि मुझे सभी प्रिय हैं.हाँ सारंगी तथा संतूर  मुझे सर्वाधिक प्रिय हैं .


अगर कोई संगीत को अपना केरियर चुनना चे तो आप उसे क्या सलाह देना पसंद करेंगी दीदी ?


मार्ग सरल नहीं...यह अपार आस्था, धैर्य और श्रम मांगती है.स्थापित होने में समय लगता है और सबसे बड़ी बात कि यदि लक्ष्य धन और प्रतिष्ठा प्राप्ति हो तो यह कैरियर विकल्प सबसे बुरा है.यदि कोई इसके प्रति निष्काम समर्पण की भावना रखता है तो देर सबेर नाम प्रतिष्ठा और धन तो मिलना ही है.


तो यह थे भारतीय संगीत के बारे में रंजना दीदी के सुविचार .
अगली कड़ी में फिर जानेंगे किसी महान ब्लोगर के संगीत के बारे में विचार
तब तक के लिए नमस्ते .






9/23/2009

हुआ पूरा एक साल (भेंटवार्ता अनूप शुक्ला जी से )

देखते ही देखते एक साल पूरा हो गया ,कुछ चुनिंदा पोस्ट्स, लेकिन ब्लॉग जगत में मिलने वाले  ढेर सारे अपनेपन  ,आर्शीवाद और प्रोत्साहन ने मेरा आत्मविश्वास द्विगुणित कर दिया,पहले लगता था is पॉप रॉक के ज़माने में यह संगीत सफ़र अकेले ही पूरा करना होगा ,लेकिन आज मेरे साथ पूरा ब्लॉग जगत हैं .


साल पूरा हो गया तो मैंने सोचा की क्यों नहीं हमारे ब्लोगर  विद्वत् जनों से उनके संगीत संबंधी विचार जाने जाये और उसे एक श्रृंखला का रूप दिया जाये .इसलिए मैंने कुछ प्रश्न हमारे महान चिठ्ठाकारो को भेजे ,और उनका बड़प्पन  की उन्होंने मुझे इनके जवाब भी भेजे .


यह प्रयास हैं भारतीय संगीत और उससे जुडी समस्याओं को समझने का और उन्हें सुलझाने का .
is कड़ी में आज सुप्रसिद्ध चिठ्ठाकार श्री अनूप शुक्ला जी की भेंटवार्ता .


ब्लॉग की दुनिया में आदरणीय अनूप शुक्ला जी वह नाम हैं जिनके लिए  किसी परिचय की जरुरत नहीं .यह " वीणापाणी "(ब्लॉग)का सौभाग्य हैं की अनूप जी ने इसके लिए भेंटवार्ता दी .प्रस्तुत हैं ,उनसे पूछे गए प्रश्नों पर उनके मूल्यवान उत्तर .


अनूप जी भारतीय संगीत क्या हैं आपकी नज़र में?

मेरी समझ में भारतीय संगीत भारत देश में प्रचलित संगीत है। पुराने समय में अपने आनन्द और ईश्वर की आराधना के लिये गाकर अपने भाव प्रकट करने के तरीके से शुरु हुआ संगीत ही है! शुरु में केवल गायन रहा होगा, बाद में वाद्य जुड़ते गये होंगे।


-आप कितनी देर संगीत सुनते हैं?

कोई तय नहीं। खास तौर से संगीत सुनने जैसी बात नहीं। ऐसे ही आते-जाते चलते फ़िरते रेडियो, टीवी पर संगीत सुन लेते हैं।


आपको वोकल ज्यादा पसंद हैं या इंस्ट्रुमेंटल ?

वोकल। वह ज्यादा समझ में आता है।


आपके जीवन में संगीत की कितनी प्राथमिकता  हैं


पूरा जीवन ही संगीत मय है। तय, ताल , धुन जीवन के हर अंग में किसी न किसी न किसी तरह मौजूद हैं और जीवन को प्रभावित करते हैं।  बोलने-चालने में तारतम्य, क्रम, अनुशासन  संगीत का ही तो अंग है शायद!  खासतौर से रियाज करने, गाने से अलग भी संगीत ही है जो हमारे जीवन में रस का संसार करता है
बहुत प्राथमिकता है संगीत की जीवन में।





-आप पसंदीदा संगीत का कलैक्शन भी रखते हैं या जैसा सुनने को मिल जाए?

जैसा सुनने को मिल जाये। जिनकी बात लोग कहते हैं उनको सुनने का मन करता है।



आप क्या मानते  हैं ?एफएम क्रांति भारतीय संगीत के प्रसार के लिए सहायक है या अपसंस्कृति ?

एफ़ एम क्रांति एक माध्यम है लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का मनोरंजक तरीके से। संगीत अनुशासन की बात करता है।  इससे लगता है कि यह अपसंस्कृति का प्रसार कर रहा है। यह तो अपने समाज के लोगों पर है कि वे इस सुविधा का उपयोग कैसे करते हैं। एफ़एम  संगीत के प्रसार में सहायक हो सकता है अगर इसका सही , मनोरंजक तरीके से और चतुराई पूर्ण प्रयोग किया जाये।



-आप सिर्फ श्रोता हैं या खुद भी संगीत की किसी विधा की शिक्षा ली है?

मैं मात्र श्रोता हूं। कोई शिक्षा नहीं पाई! इसका अफ़सोस भी है। :)


-आपके परिवार में संगीत का माहौल है या सिर्फ आपकी रुचि विकसित हुई?

हमारे परिवार में संगीत का माहौल है। हमारी माताजी, पत्नी  और बच्चे और  संगीत से संबंधित कार्यक्रम रुचि से देखते हैं। पत्नीजी को संगीत की अच्छी जानकारी भी है। अध्यापन भी करती हैं संगीत का।



-भारतीय संगीत की  लोकप्रियता अपेक्षाकृत कम होने के कारण?(आपको क्या लगता हैं की भारतीय संगीत क्यों लोगो को दूसरे संगीत के मुकाबले कम आकर्षित कर रहा हैं ?)

इसका अत्यधिक अनुशासित होना, समय की कमी होना। भारतीय संगीत घंटो रियाज की मांग करता है। भारतीय संगीत का अच्छा जानकार होने के लिये पहले शायद काफ़ी ट्रेनिंग चाहिये होती है। दूसरे विकल्प जल्दी में अपनाये जा सकते हैं। फ़ास्ट फ़ूड की तरह। लेकिन भारतीय संगीत में एक बार रुचि जागने पर फ़िर यह जीवन भर नहीं छूटता।  भारतीय संगीत दूसरों के मुकाबले कम आकर्षित करता है शायद लेकिन लोग भूल-भटककर इसकी तरफ़ आते हैं।



-आप किस तरह का संगीत पसंद करते हैं ?(भारतीय शास्त्रीय  संगीत,लोक संगीत ,सुगम संगीत यथा गीत ,भजन ,ग़ज़ल ,या फ़िल्मी संगीत  )

सुगम संगीत।

-आपका पसंदिता कोई गीत ?(संभव हो तो आपकी आवाज़ में )
बहुत से हैं।
ऐ मेरे वतन के लोगों,
आ चल के तुझे मैं ले के चलूं,
इन आंखों की मस्ती के दीवाने हजारों हैं
नदी नारे न जाऊ श्याम पैंया पडूं
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें।

ये तुरन्त याद आये। और भी बहुत से हैं। गाकर नहीं जी ईईईईईई।


-आपके अनुसार क्या प्रयास किये जाने चाहिए भारतीय संगीत को लोकप्रिय बनाने हेतु ?
संगीत को सुगम बनाया जाना। सुगम और आकर्षक कैसे बनाया यह संगीत के जानकार लोगों को तय करना होगा समाज को देखते हुये।


-अगर आपको भारतीय संगीत के किसी एक वाद्य को चुनने का मौका मिला तो आप किस वाद्य को अपना वोट देंगे ,जैसे सितार गिटार, वीणा, सरोद, वायलिन .
सितार/वीणा।

-अगर कोई संगीत को अपना केरियर चुनना चे तो आप उसे क्या सलाह देना पसंद करेंगे ?
संगीत साधना करें लेकिन खाने-पीने का जुगाड़ भी हो। बहुत ऊंचे दर्जे का कलाकार अगर भूखे रहे तो वह  संगीत की लम्बे समय तक सेवा न कर न कर पायेगा
सुनते हैं अनूप जी का पसंदिता गीत " ऐ मेरे वतन के लोगो









तो यह थे अनूप जी,
आगली कड़ी में फिर मिलेंगे एक महान चिठ्ठाकार से .

8/29/2009

दुनिया जिसे कहतें हैं .................

दुनिया जिसे कते हैं जादू काa खिलौना हैं ,मिल जाए तो मिटटी हैं खो जाए तो सोना हैं ..................सच हैं न! इस जादू के खिलौने को समझ पाने के लिए पुरा पुरा जीवन लगा दिया लोगो ने । किसी ने शास्त्र लिखे,किसीने ग्रन्थ रचे . १०-२० पन्नो के आलेख में भी इंसान जो न कह पाए वह एक पंक्ति में गजलकार ने कह दिया ,और कुछ इस तरह से कहाँ की हर मन पर अंकित हो गई यह गजल ।


संगीत से चाहे कितना ही अल्प परिचय क्यों हो!शास्त्रीय संगीत की राग रचना,आलाप,सुरताल का ज्ञान हो, हो,लोक संगीत की सरसता,प्रवाहशीलता में मन बहे बहे,फ़िल्म संगीतकी सुरीली झंकारों पर पाव थिरके थिरके,पर गज़ल वह विधा हैं कि हर किसी को पसंद आती हैं,हर किसी को अपनी सी लगती हैं,हर कोई सुनना पसंद करता हैं,गुनगुनाना पसंदकरता हैं,सच कहे तो कभी यह अपने ही दिल कि बात सुनाती सी,कहती सी लगती हैं इसलिए आज जब कई अन्य सांगीतिक विधाये अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं,तब गज़ल हर मन छा गई हैं,हर दिल पर राज कर रही हैं

7/28/2009

वक़्त के संग चलते चलते .........

समय के साथ चलने के लिए कई बार इंसान को बदलना पड़ता ,पुराने विचारो के साथ नए विचारो का सामंजस्य कुछ इस तरह से बिठाना पड़ता हैं की पुराने संस्कारो का भी आदर हो और नए विचारो का भी स्वागत । बात सिर्फ़ इंसान के बदलने की ही नही हैं .समय के साथ स्वयं को बनाये रखने के सभी को बदलना पड़ता हैं चाहे वे फ़िर वाद्य ही क्यो नही हो .हम पिछली पोस्ट में बात कर रहे थे सितार की ,सितार जिसने समय के साथ स्वयं को बदल कर आज अन्य वाद्यों के समक्ष एक कड़ी चुनौती प्रस्तुत की हैं ।

7/24/2009

नाम ही काफी हैं ..

कहते हैं नाम में क्या रखा हैं ,पर अगर किसीका नाम ही उसकी पहचान के लिए काफी हो तो?नही मैं न तो किसी दैवीय अवतार की बात कर रही हूँ नही किसी महान कलाकार की । मैं जिसकी बात कर रही हूँ उसने बड़े ही कम समय में केलोकप्रियता के वह आयाम छु लिए हैं जिसे पाने के लिए अच्छे अच्छे तरस जाते हैं । जिसकी आवाज़ की मधुरता के कारण न जाने कितनो ने इसे चाहा हैं,जिसके सुरों ने शायद ही किसी इन्सान को भावविभोर न किया हो।जिसे चाहने वालो की संख्या की गिनती करना असंभव हो और जो देश में ही नही विदेशो में भी छा

कुछ अनुमान लगाया आपने ?चलिए मैं ही बता देती हूँ मैं बात कर रही हूँ ,सितार की । सितार जिसके तारो को छेड़ते ही ह्रदय में संगीत की स्वर लहरिया हिलोले लेने लगती हैं ,जो मुझे बचपन से अतिप्रिय हैं




१८ वी और १९ वी शताब्दी में सितार के कई महान कलाकार हुए ,पहले की सितारे या तो आकार में बड़ी होती थी या छोटी । आज की तरह मध्यम आकार की सितारे तब नही होती थी ,समय के साथ साथ सितार का विकास हुआ,उसका स्वरूप बदला साथ ही साथ उस पर बजायी जाने वाली वादन सामग्री परिवर्धित हुई । अब उदाहरण के लिए पहले बड़ी सितारों पर सिर्फ़ आलाप, जोड़, मिंड का काम ही होता था ,और छोटी सितारों पर द्रुतलय काम ,उस समय ऐसी कोई भी सितार नही थी जिस पर आलाप से लेकर तानो और झाला तक यानि धीमी लय से लेकर द्रुत लय तक का काम एक साथ किया जा सके.शाह सदारंग ने सितार पर बजायी जा सकने वाली पहली योग्य गत बनाई, उस्ताद मसीत खान साहब की बनाई मसीत खानी गते और उस्ताद राजा खां साहब की बनाई राजा खानी गते बड़ी लोकप्रिय हुई । मसीत खानी गत यानि विलंबित (धीमी )लय में बजने वाली गत ,और राजा खानी द्रुत लय में बजने वाली गत हुआ करती थी .जिस प्रकार गायन में बंदिश या ख्याल के सहारे राग या गायन का विस्तार होता हैं उसकी प्रकार वादन में गतो की सहायता से राग और वादन का विस्तार किया जाता हैं .उस्ताद इमदाद हुसैन खां साहब ने सितार में वादन के बारह अंगो का समावेश किया ,इस समय वादकों ने सितार के बाज को काफी विकसित किया ।चित्र में उस्ताद इमदाद हुसैन खां साहब सितार वादन करते हुए



सितार का एक पुराना चित्र भी दे रही हूँ ऐसी सितारे हमने भी बचपन में काफी देखि हैं



सितार की स्वर यात्रा में आज बस इतना ही ,अगली पोस्ट में सितार का विकास कैसे हुआ ,किन महान संगीतग्यो का योगदान इसमें रहा,और आज सितार की वादन शैली कितनी अधिक परिवर्धित्त हो गयी हैं आदि ।
लीजिये सुनिए स्वर्गीय उस्ताद इमदाद खान साहेब का सितार वादन, राग हैं खमाज ,यह एक बहुत ही दुर्लभ ,अप्राप्य रिकॉर्डिंग हैं ।
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7/21/2009

शत शत नमन ..


किराना घराने की महान गायिका आदरणीय गंगुबाई हंगल जी का आज निधन हो गया उन्हें शत शत नमन

उनके पुण्य स्मरण स्वरुप प्रस्तुत हैं उनके गायन की रीकोर्डरिंग्स ....

राग कलावती

7/09/2009

कभी सुना हैं इंटरनेटीय संगीत ?

सभी संगीतकार मानते हैं संगीत ईश्वर की तरह यत्र तत्र सर्वत्र हैं,झरने की झर झर में ,चिडियों की ची ची में,हवा की गति में ,बारिश की रिमझिम में,सृष्टि के कण कण में संगीत का वास हैं,संगीत उत्त्पत्ति काल से लेकर ,मंदिरों से निकल कर,दरबारों से निकल कर ,सर्वसाधारण मनुष्य तक पंहुचा,युग बदला . २० वे शतक में संगीत ग्रामोफोन (Gramophone),रेकॉर्ड्स ,सिडी (c.d)और फ़िर कम्प्यूटर (computer )तक पहुँचा । पहले संगीत प्रेमी मिलों पैदल चल कर एक गाँव से दुसरे गाँव संगीत सुनने जाते थे ,वे अब अपने ही शहर ,गाँव में बैठे बैठे ,) टीवी (T.V),और म्यूजिक प्लेयर (music player )पर संगीत सुनने लगे । २० वे शतक के उत्तरार्ध में विश्व में क्रन्तिकारी तकनिकी विकास हुआ ,और इस विकास का सशक्त स्वरूप सामने आया इंटरनेट के रूप में ।

पहले घर में दो चार घंटे अकेले रहना यानि या तो किताबो का साथ या टीवी के शौकीनों के लिए धारावाहिकों का । लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा था की कुछ सालो बाद हम सब घर में रहकर भी पुरे विश्व से कुछ इस कदर जुड़ जायेंगे,जैसे पुरा विश्व हमारे साथ हमारे घर में ,हमारे आँगन में बस रहा हो ?"वसुधैव कुटुम्बकम " का स्वप्न इंटरनेट के कारण एक आज सत्य हो पाया हैं ।

हाँ तो बात हो रही थी कला और कलाकारों की ,संगीत और संगीतकारो की ,कला प्रेमियों की संगीत प्रेमियों की । शिक्षण के क्षेत्र में इंटरनेट ने जहाँ अहम् भूमिका निभाई हैं वहां कला और संगीत के क्षेत्र में भी । गूगल पर इंडियन क्लास्सिकल म्यूजिक (indian classical music )डाला और सर्च बटन पर क्लिक किया की हजारो साइट्स जो भारतीय संगीत से संबंध रखती हैं सामने आ जाती हैं .कुछ संगीतकारों की अपनी साइट्स ,कुछ हिन्दी गीतों को समर्पित साइट्स ,कुछ विशुद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीत को समर्पित जिनमे संगीतकारों का संगीत सुनने के लिए ,डाउनलोड करने के लिए सहज उपलब्ध होता हैं । इस प्रगति के साथ ही एक बड़ी प्रगति उन साइट्स के रूप में सामने आई हैं जो शास्त्रीय संगीत का शिक्षण देती हैं । संगीत संस्थानों के साथ ही कुछ कलाकारों ने भी अपनी इसी ही साइट्स बने हैं । ब्लॉग तो इंटरनेट का वरदान हैं,संगीत प्रेमी ,संगीतकार इस मध्यम के जरिये अपने विचार श्रोताओ ,संगीत रसिको तक पहुँचा रहे हैं ।

कुछ दिन पहले पुणे में अंडरस्कोर रेकॉर्ड्स द्वारा एक सेमिनार का आयोजन किया गया ,जिसका विषय था संगीत आपका संगत इंटरनेट की । वहां आमंत्रित कलाकारों,अपनी स्वयं की वेबसाइट्स रखने वाले संगीत प्रेमियों,वाद्य निर्माताओ ने इस विषय में अपने विचार वयक्त किए ,इस विषय पर गहन चर्चा हुई की इंटरनेट के द्वारा संगीत की शिक्षा कैसे दी जा सकती हैं ,संगीत को अधिक से अधिक श्रोताओ तक कैसे पहुचाया जा सकता हैं ,इंटरनेट पर संगीत जगत को अधिक समृद्ध कैसे किया जा सकता हैं ,विषय नया था ,दिलचस्प भी था। काफी नई बातें सामने आई । आख़िर समय के साथ ताल मिलकर चलने के लिए संगीत को भी अपनी गति द्रुत करनी होगी और अपना सुर नए विश्व के सुर से मिलाना होगा ।

सुर ताल की संगती करती यह कुछ साइट्स :

http://www.shadjamadhyam.com/ पर जहाँ ऑनलाइन संगीत की शिक्षा दी जाती हैं वहीं http://www.parrikar.org/ पर महान शास्त्रीय संगीत गायकों का संगीत(Archiv music ) सुनने के लिए सहज उपलब्ध हैं । http://www.musicindiaonline.com/ से तो काफी संगीत प्रेमी परिचित हैं । राजीव जी का यह पेज,पुराने गायकों का संगीत, जो ७८ rpm के युग में रिकॉर्ड हुआ था उपलब्ध करवा कार हमें पुराने शास्त्रीय संगीत गायकों के संगीत से परिचित करवाता हैं : http://courses.nus.edu.sg/course/ellpatke/Miscellany/music.htm .आदरणीय शुभा मुद्गल जी का यह ब्लॉग http://www.shubhamudgal.com/ संगीत जगत के कई विचारणीय मुद्दों से हमारा परिचय करवाता हैं और हमारी जानकारी बढ़ाता हैं । http://sarod.com पर हम उस्ताद अमज़द अली खान साहेब के विषय में जहाँ काफी कुछ जान सकते हैं वहीं उनके सरोद वादन के कुछ अंश देख भी सकते हैं । http://homepage.mac.com/patrickmoutal/macmoutal/rag.html इस पेज पर भी आप बहुत अच्छा संगीत सुन सकते हैं .

कुछ वाद्य निर्माताओ की भी अपनी साइट्स हैं जहाँ आप और हम संगीत वाद्यों की ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं जैसे http://www.rikhiram.org/

तो भारतीय संगीत अब इंटरनेटीय संगीत हो रहा हैं ,मुझे तो यही लगता हैं की यह इंटरनेटीय संगीत भारतीय संगीत का हाथ थाम उसे महान ऊँचाइयों तक ले जाएगा ।

इति
वीणा साधिका
राधिका

6/18/2009

जब मुझे विचित्र वीणा वादन हेतु मिला आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी से आशीर्वचन

शाम के यही कोई आठ बजे का समय था , बनारस में गंगा मैया झूम झूम कर बह रही थी और कई युवा संगीत कलाकारों को शब्द ,स्वर और लय की सरिता में खो जाने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी ,नगर के एक सभागार में 'आकाशवाणी संगीत प्रतियोगिता' के विजेताओ का संगीत प्रदर्शन हो रहा था ,मैं मंच पर विचित्र वीणा लेकर बैठी ,श्रोताओ की पहली पंक्ति में ही श्रद्धेय स्वर्गीय किशन महाराज जी को देखा और दोनों हाथ जोड़ कर उन्हें नमस्कार किया ,तत्पश्चात वीणा वादन शुरू किया ,जैसे ही वादन समाप्त समाप्त हुआ ,आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी मंच पर आए ,अपना हाथ मेरे सर पर रखा और कहा "वीणा अच्छा बजा रही हो ,खूब बजाओ "। उनका यह आशीर्वाद और फ़िर उनके हाथ से स्वर्ण पदक पाकर मेरी संगीत साधना सफल हो गई ,जीवन का वह क्षण मेरे लिए अविस्मर्णीय हैं ।

कई बार कई संगीत समारोह में उनका तबला सुनने का अवसर भी मुझे प्राप्त हुआ , उनका तबला चतुर्मिखी था ,तबले की सारी बातें उसमे शामिल थी , लव और स्याही का वे सुझबुझ से प्रयोग करते थे ,उनके उठान ,कायदे रेलों और परनो की विशिष्ट पहचान थी । उन्होंने तबले में गणित के महत्व को समझाया ,वे किसी भी मात्रा से तिहाई शुरू कर सम पर खत्म् करते थे ,जो की अत्यन्त ही कठिन हैं । प्रचलित तालो के अतिरिक्त वे अष्ट मंगल,जैत जय,पंचम सवारी , लक्ष्मी और गणेश तालो का वादन भी बहुत सुगमता और सुंदरता से करते थे . तबले की कई घरानों की रचनाओ का उनके पास समृद्ध भण्डार था ।

आदरणीय पंडित रवि शंकर ,उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब,पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ ही ,आदरणीय शम्भू महाराज ,सितारा देवी आदि के साथ उन्होंने संगत की । देश विदेश की कई संगीत सभाओ में तबला वादन की प्रस्तुति देकर तबले का प्रेम श्रोताओ के ह्रदय में अचल स्थापित किया ।

लय भास्कर ,संगती सम्राट ,काशी स्वर गंगा सम्मान, संगीत नाटक अकादमी सम्मान , ताल चिंतामणि ,लय चक्रवती , उस्ताद हाफिज़ अली खान व अन्य वादन उठाये के साथ पद्मश्री , पद्मभूषण अलंकरण से उन्हें नवाजा गया ।

वे ३ सितम्बर १९२३ की आधी रात को ही इस धरती पर आए थे और चार मई २००८ की आधी रात को ही वे इस धरती को छोड़,स्वर्ग की सभा में देवो के साथ संगत करने के लिए हमेशा के लिए चले गए। उनके जाने से हमने एक युगजयी संगीत दिग्गज को खो दिया ,पर उनका आशीर्वाद हम सभी के साथ हमेशा हैं ,इस बात से थोड़ा धैर्य मिलता हैं । आदरणीय स्वर्गीय किशन महाराज जी को मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि :

सुनिए उनका तबला वादन






इति
वीणा साधिका
राधिका

(राधिका बुधकर )

6/04/2009

जीवन के रंग हज़ार ..


सुबह ६:२० का समय,आकाश का गहरा नीला रंग कुछ हल्का हो रहा हैं,रास्ते पर अब भी१०-१५ लोग ही नज़र आ रहे हैं,पंछियों की क्या कहिये ? उनके नाम पर यहाँ सिर्फ़ कबूतर ही नज़र आते हैं . सैकडो की संख्या में एक ईमारत से उड़कर दूसरी ईमारत तक पहुचते हुए ये किसी महासेना से कम नही दिखाई देते,जीवन युद्ध ' एकला चलो रे' के मंत्र से नही,वरन संगठन की शक्ति से ही जीता जा सकता हैं,शायद इस बात का इन्हे पुरा एहसास हैं ।

मैं घर की बालकनी में खडे सामने की पहाड़ी पर देख रही हूँ,जीवन वहाँ अभी शांत हैं,वहाँ के पशु पक्षियों और वृक्ष- पौधों को शायद अब भी प्रभात के आगमन का भान नही हैं । किसी छोटे बच्चे की तरह, रात में खिली चांदनी की रुपहली रजाई ओढे वो अभी सो ही रहे हैं और माँ उषा प्रभाती गा कर उन्हें जगाने का असफल प्रयास कर रही हैं ।
माँ उषा को अपने बच्चो को जगाने के प्रयास में विफल होता देख ,सूर्यदेव अपने रश्मिरथ पर सवार हो अपनी सुंदर किरणों का झिलमिल प्रकाश माँ प्रकृति के आँचल में भर देते हैं ,ताकि वह अपने आँचल में समेट अपने इन पुत्रो को जीवन मंच पर अपनी भूमिका का निर्वाह करने के लिए पुनः जागृत कर सके ।

जीवन यहाँ से अपना रंग बदलना शुरू करता हैं ,नवजात शिशु के समान सुबह का हल्का लाल रंग .. कुछ ही पलों में सहस्त्र रश्मियों के सुसज्जित सूर्य अपने अद्वितीय सौन्दर्य के साथ उदित होना प्रारम्भ करता हैं और माँ प्रकृति के शिशु अंगडाई भर,रात की रुपहली रजाई को हल्का सा झटक उठने का प्रयत्न करते हैं ,पहाड़ी के उपर बिखरा बादल वह रजाई ही तो हैं ।

मैं अपलक सृष्टि की इस अद्भुत लीला को निहार रही हूँ और सोच रही हूँ दिन और रात का इतना सुंदर चित्रण करने वाला चित्रकार वह आदि आनादी ईश्वर इस समय क्या कर रहा होगा ?शायद उसने अभी चेतना का प्रथम श्वास लिया होगा और यहाँ भूमंडल पर सवेरा हो गया ।

कुछ ही क्षणों में देखते ही देखते सूर्य पहाड़ी पर आकाश दिवा की तरह अपने पूर्ण रूप में जगमगाने लगता हैं ,चमचमाती किरणों से प्रस्फुटित हजारो रंग बिखर - बिखर कर अपनी दिव्यता से संसार को रंगीन करते हैं ,जीवन यही सारे रंग समेट कर जागता हैं,बढ़ता हैं, सँवरता हैं । कभी नाते रिश्तो के ताजे वासंती रंगो को समेट प्रेम का रंग बनाता हैं जीवन ,कभी जीत हार के चोखे फीके रंगो से चित्रकारी करता हैं जीवन ,भोर के लाल रुपहले रंगो साथ यह चितेरा रंगो की सुंदर इबारत रच देता हैं ,फ़िर ६० के दशक में सुनहले होते सर के बाल अनुभवो के रंगो की ऋचाओ को पठन अपने युवाओ को सुनाते हुए रात्रि की तारीकाओं से चमकीले चाँदी से सफ़ेद सर के साथ जीवन की संध्या को सांध्य प्रणाम कर आकाश में विलुप्त हो जाते हैं । आने वाली सुबह जीवन पुनः रश्मिरथ पर सवार हो -हजारो हजारो रंग समेट आएगा......


अपने विचारो में मैं जीवन के कितने रंग देख आई . मुंबई की भागम भाग वाले भीड़ भाड़ वाले जीवन में,सुबह का यह दृश्य भाग्यशालियों को ही नसीब होता हैं और मैं शयद उन्ही भाग्यवनों में से एक हूँ । सुना तो था मुंबई ऐसी मुंबई वैसी । सोचा जीवन को हजारो आकर और रूप देती मुंबई के जीवन का रंग भी देख ही लू और इसलिए मैं सपरिवार मुंबई रहने चली आई। कभी घर का सामान ठीक करने, कभी घर से जुड़ी सारी वयव्स्थाये करने में एक- देड महीने का समय पंख लगा कर उड़ गया .एक शहर से दुसरे शहर स्थानांतरण सरल तो कभी होता नही न ! इसी कारण ब्लॉग भी न लिख पाई।

आशा करती हूँ की अब जब मुंबई आ ही गई हूँ तो मुंबई और जीवन एक हजारो रंग देख ही लुंगी और जो भी रंग मुझे पसंद आएगा उसे आप पाठको तक अपनी पोस्ट के माध्यम से जरुर पहुचाउंगी ।

4/19/2009

जब मिला तबले को वरदान :सुनिए अद्भुत तबला वादन


रात का समय ....जब पुरी दुनिया गहरी नींद में सो रही थी ...तब वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में तबले की थाप गूंज रही थी ,तबले के बोल मानो ईश्वरीय नाद की तरह सम्पूर्ण वातावरण में बहकर उसे दिव्य और भी दिव्य बना रहे थे,अचानक न जाने क्या हुआ और तबले की ध्वनी कम और मंदिर की घंटियों की आवाज़ ज्यादा सुनाई देने लगी ,उन्होंने पल भर के लिए तबले की बहती गंगा को विराम दिया और सब कुछ शांत हो गया ,उन्होंने फ़िर तबले पर बोलो की सरिता का प्रवाह अविरत किया और फ़िर मंदिरों की घंटिया बजने लगी ,सुबह लोगो ने कहा उन्हें ईश्वरीय वरदान मिला हैं ,संकट मोचन हनुमान ने स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी के तबले को वरदान दिया , और उनका तबला युगजयी हो गया ।

स्वर्गीय पंडित किशन जी का जन्म , जन्माष्टमी की वैसी ही आधी रात को हुआ जैसी आधी रात में युगों युगों तक हर ह्रदय पर राज्य करने वाले किशन कह्नैया का जन्म हुआ था ,इस जन्माष्टमी की आधी रात को शायद वर मिला हैं की इस रात दिव्य आत्माए ,देव ,गंधर्व ही पृथ्वी पर जन्म लेंगे ।

स्वर्गीय पंडित किशन महाराज प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे ,माथे पर एक लाल रंग का टिक्का हमेशा लगा रहता था ,वे जब संगीत सभाओं में जाते ,संगीत सभाए लय ताल से परिपूर्ण हो गंधर्व सभाओ की तरह गीत ,गति और संगीतमय हो जाती । अपने पिताजी पंडित हरि महाराज जी से संगीत शिक्षा लेने के उपरांत आदरणीय पंडित किशन महाराज जी ने अपने चाचा पंडित कंठे महाराज जी से शिक्षा ग्रहण की ।

बनारस के संकट मोचन मंदिर में ही पहला संगीत कार्यक्रम देने के बाद सन १९४६ में पंडित जी में मुंबई की और प्रस्थान किया,एक बहुत बड़े संगीत कार्यक्रम के अवसर पर देश के श्रेष्ठ सितार वादक पंडित रविशंकर जी और पंडित किशन महाराज जी पहली बार मिले,जैसे ही इनका वादन सम्म्पन हुआ ,श्रोताओ में से आदरणीय ओमकारनाथ ठाकुर जी उठे और मंच पर जाकर उन्होंने घोषणा की "यह दोनों बच्चे भविष्य के भारतीय शास्त्रीय संगीत के चमकते सितारे होंगे । "उसी दिन से पंडित रविशंकर जी,ओर स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी में गहरी मैत्री हो गई ।

तबला बजाने के लिए वैसे पद्मासन में बैठने की पद्धत प्रचलित हैं ,किंतु स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी दोनों घुटनों के बल बैठ कर वादन किया करते थे ,ख्याल गायन के साथ उनके तबले की संगीत श्रोताओ पर जादू करती थी ,उनके ठेके में एक भराव था , और दाये और बाये तबले का संवाद श्रोतोई और दर्शको पर विशिष्ट प्रभाव डालता था ।

अपनी युवा अवस्था में में पंडित जी ने कई फिल्मो में तबला वादन किया ,जिनमे नीचनगर ,आंधियां,बड़ी माँ आदि फिल्मे प्रमुख हैं ।

कहते हैं न महान कलाकार एक महान इंसान भी होते हैं ,ऐसे ही महान आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी भी थे ,उन्होंने बनारस में दूरदर्शन केन्द्र स्थापित करने के लिए भूख हड़ताल भी की , संगत कलाकारों के प्रति सरकार की ढुलमुल निति का भी पुरजोर विरोध किया ।

सुनिए स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी का तबला वादन


श्रद्धेय किशन महारज जी को मेरा सादर प्रणाम :
इति
वीणा साधिका
राधिका
(राधिका बुधकर )

लेख के अगले अंक में :जब मुझेविचित्र वीणा बजाने हेतु मिला आदरणीय स्वर्गीय पंडित किशन महाराज जी से आशीर्वचन

4/01/2009

मिलिए सुर और उसके करीबियों से






सुरों की दुनिया एक अनोखी दुनिया। सुरों के जादू से कहाँ कोई बच पाया हैं,राजा हो या रंक,बालक हो या वृद्ध ,देव हो या दानव ,पशु हो या वनस्पति सब प सुरों का जादू चला हैं




सुर से संगीत हैं और संगीत से जीवन संग सुरीली संगती।





सुर संगीत की उत्पत्ति का इतिहास हमने जाना ,भारतीय पाश्चात्य स्वर संगीत को जाना , किंतु सम्पूर्ण संगीत साम्राज्य के अधिष्ठाता सुर हैं क्या ?यह जानना भी तो आवश्यक हैं न ।




ध्वनी
अर्थात एक ऐसा आवाज़ जिसे हम स्पष्ट पहचान सके और उसका पुनरुत्पादन संभव हो ।

हम अपने चारो और रोज़ विभिन्न ध्वनियाँ सुनते हैं ,किंतु सभी ध्वनियाँ कर्णप्रिय या मधुर नही होती .कुछ ध्वनियाँ मधुर होती हैं ,वो सुनने में अच्छी लगती हैं .कानो को प्रिय इन कर्णप्रिय ध्वनियों को नाद कहा गया । अधिक सरल भाषा में कहे तो नाद अर्थात वह ध्वनी जिससे संगीत उपजने की सम्भावना हो । इसी नाद रूपी ध्वनी से स्वर निर्माण होता हैं ।

ध्वनी या आवाज़ तरंगो के रूप में हवा में तैरती हैं .हर आवाज़ की तरंगाकृति अलग होती हैं ,

आवाज़ किसकी हैं,वह मनुष्य की हैं ,किसी सांगीतिक वाद्य यंत्र की हैं ,आवाज़ या हम कहे नाद कितना बड़ा या छोटा हैं ,साथ ही आवाज़ की कंपन संख्या। यह तीन आवाज़ के महत्वपूर्ण घटक गुणधर्म हैं।

आवाज़ की कंपन संख्या frequency यह बताती हैं की एक सेकेण्ड में आवाज़ कितनी बार कंपित हुई हैं । यह कंपन संख्या कुछ समय तक एक जैसी और यथावत रहे तो निर्मिती होती हैं सुर की । कंपन संख्या बदलने से स्वर या सुर भी बदल जाता हैं । इन कंपन संख्याओ में अधिक अन्तर हो तो बदला हुआ स्वर एक साधारण श्रोता भी आसानी से समझ सकता हैं ,लेकिन अगर इन कंपन संख्याओ में अन्तर अत्यधिक कम हो तो स्वर में हुआ मामूली अंतर केवल स्वर की अच्छी पहचान रखने वाला संगीतग्य ही जान सकता हैं ।

अगर टीवी शोस का उदहारण लिया जाए ,तो कई बार गायक या गायिका सुर में नही गाते,ये सुर में नही गा रहे हैं यह संगीत प्रेमी आसानी से जान जाते हैं और कहते भी हैं की यह गायक बेसुरा हो रहा हैं । लेकिन कई बार सुरों निश्चित स्थान और गायक या गायिका के द्वारा गाये जाने वाले सुरों के स्थान(या कंपन संख्या ) में इतना- इतना कम अंतर होता हैं की एक संगीत रसिक को लगता हैं की गायन सुर में ही हो रहा हैं ,लेकिन जिन संगीतज्ञों के कान सुरों के मामले में पक्के हैं ,वह बता सकते हैं की यह कनसुरा हैं ।



सुरों की यह समझ विकसित होती हैं संगीत के प्रति अत्यन्त प्रेम ,साधना और अधिक से अधिक संगीत श्रवण से । तो आप भी सुनिए अच्छा संगीत और जान लीजिये सुरीले ,बेसुरे और कनसुरे में भेद ।

3/20/2009

बंसुरी के स्वर में डूबा नीला आसमां

मुरली से उनका प्रेम अब जग जाहिर होने लगा,भारत ही नही विदेशो में भी उनकी मुरली के सुर लोगो को आनंदित करने लगे । पंडित हरीप्रसाद चौरसिया जी की बांसुरी वादन की शिक्षा और कटक के मुंबई आकाशवाणी केन्द्र पर उनकी नियुक्ति के बारे में हमने आलेख के पिछले अंक में जाना ,अब आगे ...

पंडित हरिप्रसाद जी के मुरली के स्वर अब श्रोताओ पर कुछ ऐसा जादू करने लगे की उनके राग वादन को सुनकर श्रोता नाद ब्रह्म के सागर में डूब जाने लगे,उनका बांसुरी वादन श्रोताओ को बांसुरी के सुरों में खो जाने पर विवश करने लगा । संपूर्ण देश भर में उनके बांसुरी के कार्यक्रम होने लगे,भारत के साथ साथ यूरोप ,फ्रांस ,अमेरिका ,जापान आदि देशो में उनकी बांसुरी के स्वर गुंजायमान होने लगे ।

बड़ी बांसुरी पर शास्त्रीय संगीत बजाने के बाद छोटी बांसुरी पर जब पंडित हरिप्रसाद जी धुन बजाते तो श्रोता बरबस ही वाह वाह करते ,सबसे बड़ी बात यह की बड़ी बांसुरी के तुंरत बाद छोटी बांसुरी को बजाना बहुत कठिन कार्य हैं ,बड़ी बांसुरी की फूंक अलग और छोटी बांसुरी की फूंक अलग,दोनों बांसुरीयों पर उंगलिया रखने के स्थान अलग । ऐसा होते हुए भी जब वे धुन बजाते ,सुनने वाले सब कुछ भूल कर बस उनके बांसुरी के स्वरों में खो जाते ।

मैंने कई बार तानसेन संगीत समारोह में उनका बांसुरी वादन सुना हैं ,उनके आने की बात से ही तानसेन समारोह का पुरा पंडाल ठसाठस भर जाता ,रात के चाहे २ बजे या ४ श्रोता उनकी बांसुरी सुने बिना हिलते तक नही हैं ,पंडाल में अगर बैठने की जगह नही हो तो कई श्रोता देर रात तक पंडाल के बहार खडे रह कर उनकी बांसुरी सुनते हैं ,उनका धुन वादन श्रोताओ में बहुत ही लोकप्रिय हैं ,लगता हैं मानों स्वयं श्री कृष्ण बांसुरी पर धुन बजा कर नाद देव की स्तुति कर रहे हैं ।


उनके बांसुरी वादन के अनेको धवनी मुद्रण निकले हैं , १९७८ में "कृष्ण ध्वनी ""सन १९८१ में राग हेमवती ,देश भटियाली ,का रिकॉर्डिंग,१९९० में इम्मोर्टल सीरिज ,गोल्डन रागा कलेक्शन ,माया ,ह्रदय,गुरुकुल जैसे अत्यन्त प्रसिद्द रेकॉर्ड्स के साथ अन्य कई रिकॉर्ड निकले और अत्यंत लोकप्रिय हुए हैं ।

पंडित शिव कुमार शर्मा जी के साथ मिल कर शिव -हरी के नाम से प्रसिद्द जोड़ी ने चाँदनी ,डर,लम्हे सिलसिला आड़ी फिल्मो में दिया संगीत अत्यन्त लोकप्रिय हुआ ,इनके संगीत निर्देशित सिनेमा को उत्कृष्ट संगीत निर्देशन का फिल अवार्ड भी मिला हैं ।सुनते हैं सिलसिला फ़िल्म का गीत नीला आसमान सो गया ।

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पंडित हृदयनाथ मंगेशकर ,पंडित हरिप्रसाद चैरासियाँ जी के बारे में कहते हैं :"पंडित हरिप्रसाद और पंडित शिव कुमार शर्मा जी जैसे दिग्गज कलाकार हमारे साथ थे यह हमारा बडा भाग्य था । "

कई मराठी और हिन्दी गानों में बांसुरी पर बजाये पंडित जी के पाशर्व संगीत ने इन गानों में मानों प्राण भर दिए ।


पंडित जी को राष्ट्रिय व अंतरराष्ट्रिय कई सम्मान प्राप्त हुए , संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ,पद्मश्री,पद्मभूषण ,पदम्विभूषण ,कोणार्क सम्मान,यश भारती सम्मान के साथ अन्य कई महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित किया गया ।

पश्चिमी संगीत के कलाकारों के साथ इनके फ्यूजन संगीत के कई रिकार्ड्स भी निकले । वृंदावन नामक मुमी के जुहू में स्थित गुरुकुल की स्थापना पंडित जी द्वारा की गई ,इस गुरुकुल में गुरु शिष्य परम्परा से देशी -विदेशी शिष्यों को संगीत की शिक्षा दी जाती है । पंडित जी का शिष्य समुदाय काफी बडा हैं ।

पंडित हरिप्रसाद जी बांसुरी पर सुंदर आलाप के साथ वादन का प्रारंभ करते हैं ,जोड़,झाला,मध्यलय ,द्रुत गत यह सब कुछ इनके वादन में निहित होता हैं ,इनकी वादन शैली,स्सुमधुर,तन्त्रकारी के साथ साथ लयकारी का भी समावेश किए हुए हैं ।




बांसुरी पर पंडित हरिप्रसाद जी के स्वर इसी तरह युगों युगों तक भारतीय संगीत प्रेमियों के ह्रदय पर राज्य करते रहे यही मंगल कामना ।

3/09/2009

बाजे मुरलिया बाजे ..................................


संगीत की होरी बरसाती मुरली ,सुर,श्रुतिमय सुंदर रंग बिखेरती मुरली . मुरली ,बंसरी ,बाँसुरी ......वंसी ,वेणु ,वंशिका कई सुंदर नामो से सुसज्जित हैं बाँसुरी का इतिहास ,प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी अधर धरे मोहन मुरली पर ,होठ पे माया विराजे ,बाजे मुरलियां बाजे ..................
मुरली और श्री कृष्ण एक दुसरे के पर्याय रहे हैं मुरली के बिना श्री कृष्ण की कल्पना भी नही की जा सकती उनकी मुरली के नाद रूपी ब्रह्म ने सम्पूर्ण चराचर सृष्टि को आलोकित सम्मोहित किया कृष्ण के बाद भी भारत में बांसुरी रही ,पर कुछ खोयी खोयी सी ,मौन सी . मानो श्री कृष्ण की याद में उसने स्वयं को भुला दिया हो ,उसका अस्तित्व तो भारत वर्ष में सदैव रहा . हो भी कैसे ? आख़िर वह कृष्ण प्रिया थी . किंतु श्री हरी के विरह में जो हाल उनके गोप गोपिकाओ का हुआ कुछ वैसा ही बाँसुरी का भी हुआ ,कुछ भूली -बिसरी,कुछ उपेक्षित सी बाँसुरी किसी विरहन की तरह तलाश रही थी अपने मुरलीधर को, अपने हरी को

युग बदल गए ,बाँसुरी की अवस्था जस की तस् रही ,युगों बाद कलियुग में पंडित पन्नालाल घोष जी ने अपने थक परिश्रम से बाँसुरी वाद्य में अनेक परिवर्तन कर ,उसकी वादन शैली में परिवर्तन कर बाँसुरी को पुनः भारतीय संगीत में सम्माननीय स्थान दिलाया लेकिन उनके बाद पुनः: बाँसुरी एकाकी हो गई


हरी बिन जग सुना मेरा ,कौन गीत सुनाऊ सखी री ?सुर,शबद खो गए हैं मेरे ,कौन गीत बजाऊ सखी री

बाँसुरी की इस अवस्था पर अब श्री कृष्ण को तरस आया और उसे उद्धारने को कलियुग में जहाँ श्री विजय राघव राव और रघुनाथ सेठ जैसे महान कलाकारों ने महान योगदान दिया ,वही अवतार लिया स्वयं श्री हरी ने ,अपनी प्रिय बाँसुरी को पुनः जन जन में प्रचारित करने ,उसके सुर में प्राण फुकने ,उसकी गरिमा पुनः लौटाने श्री हरी अवतरित हुए श्री हरीप्रसाद चौरसिया जी के रूप में पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी ......एक ऐसा नाम जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में बाँसुरी की पहचान बन गया एक ऐसा नाम जिसने श्री कृष्ण की प्राणप्रिय बाँसुरी को ,पुनः: भारत वर्ष में ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व में, सम्पूर्ण चराचर जगत में प्रतिष्ठित किया ,प्रतिस्थापित किया , प्रचारित किया गुंजारित किया सम्पूर्ण सृष्टि को बाँसुरी के नाद देव से आलोकित किया बाँसुरी के तम् हरण ब्रह्म नाद रूपी प्रकाश से ब्रह्माण्ड को


श्री कृष्ण का जन्म हुआ था मथुरा नगरी के कारावास में ,मथुरा नगरी याने यमुना की नगरी ,उसके पावन जल के सानिध्य में श्री कृष्ण का बालपन ,कुछ यौवन भी गुजरा . पंडित हरीप्रसाद जी का जन्म जुलाई १९३८ के दिन गंगा ,यमुना सरस्वती नदी के संगम पर बसी पुण्य पावन नगरी अलाहाबाद में हुआ , पहलवान पिता की संतान पंडित हरी प्रसाद जी को उनके पिताजी पहलवान ही बनाना चाहते थे ,किंतु उनका प्रेम तो भारतीय संगीत से था ,बाँसुरी से था शास्त्रीय गायन की शिक्षा पंडित राजाराम जी से प्राप्त की और बाँसुरी वादन की शिक्षा पंडित भोलानाथ जी से प्राप्त की संगीत साधना से पंडित हरिप्रसाद जी का बाँसुरी वादन सतेज होने लगा बाँसुरी वादन की परीक्षा में सफल होने के बाद पंडित जी आकाशवाणी पर बाँसुरी के कार्यक्रम देने लगे कुछ समय पश्चात् आकाशवाणी के कटक केन्द्र पर इनकी नियुक्ति हुई और इनके उत्कृष्ट कार्य के कारण वर्ष के भीतर ही आकाशवाणी के मुख्यालय मुंबई में इनका तबादला हो गया
पहले पंडित जी सीधी बाँसुरी बजाते थे ,तत्पश्चात उन्होंने आड़ी बाँसुरी पर संगीत साधना शुरू की ,बाँसुरी में गायकी अंग ,तंत्र वाद्यों का आलाप जोड़ आदि अंगो के समागम की साधना पंडित जी करने लगे उसी समय इनका संगीत प्रशिक्षण आदरणीय अन्नपूर्णा देवी जी के सानिध्य में प्रारम्भ हुआ ,विदुषी अन्नपूर्णा जी के संगीत शिक्षा से इनकी बाँसुरी और भी आलोकित हुई
आइये सुनते हैं पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी का बांसुरी वादन, तबले पर है उस्ताद जाकिर हुसैन. ये दुर्लभ विडियो लगभग ९३ मिनट का है. हमें यकीन है इसे देखना-सुनना आपके लिए भी एक सम्पूर्ण अनुभव रहेगा.
http://www.youtube.com/watch?v=oVxdjdJ0ZAc


अगली कड़ी में पंडित हरिप्रसाद चौरासियाँ जी की बांसुरी यात्रा सविस्तार

आलेख प्रस्तुतिकरण
विचित्र वीणा साधिका
राधिका बुधकर